ब्राम्हणों की दुर्दशा का कारण- अंत्येष्टि संस्कार पर वैदिक संस्कारों कि अवमानना ।

ब्राम्हणों की दुर्दशा का कारण- अंत्येष्टि संस्कार पर वैदिक संस्कारों कि अवमानना ।  
 वैदिक संस्कार ही तो हम सब का मूल आधार हें।
यदि यह वैदिक परम्परायेँ 'पाखंड' के नाम पर
 बदनाम हो गई तो संस्कृति नष्ट हो जाएगी।
इसकी जिम्मेदारी "ब्राम्हणत्व" पर ग़ौरव करने
वाले हम सभी ब्राम्हणों की ही होगी।
 विशेषकर उन पर जिन्होंने आर्थिक स्वार्थ वश
इसके लाभकारी भाग "धन" को स्वीकार कर
शेष को भुला दिया है। ओर यह भी सोचना होगा
कि की वर्तमान में ब्राम्हणों की दुर्दशा का
यह भी एक कारण तो नहीं है। 


      अंतिम संस्कार या अंत्येष्टि संस्कार  एक मात्र  ऐसा यज्ञ है, में जिसमें जीवित व्यक्ति स्वयं शामिल नहीं हो सकता, उसका मृत शरीर सम्मलित  होता हे, सोलह संस्कारो में अंतिम होने से अंतिम संस्कार कहा  गया है।

वैदिक धर्म में हमारे ऋषि-मनीषयों ने मानव जीवन को  सुचारू रूप से चलाने, उसे महत्व पूर्ण बनाने हेतु सोलह संस्कारो का वर्णन किया है।
   अंतिम संस्कार भी पूरी एक हवन या यज्ञ  की ही एक प्रक्रिया है। इसमें पञ्च भौतिक मृत शरीर को वापिस पञ्च तत्वों में शामिल हो जाता है। यदि वह शरीर मृत अवस्था में रखा रहे तो विविध रोगों के विस्तार का कारण बनता है। जमींन  में गाडा (दफनाया) गया या जल में प्रवाहित शरीर, भूमि ओर जल भण्डारो को दूषित करेगा, खुले में वातावरण को प्रभावित करेगा। इसीलिए वैदिक सभ्यता में जलाकर नष्ट करने का नियम बनाया है।
      शरीर के जलने से उठने वाली गंध से वातावरण प्रभावित न हो इसलिए सुगधित औषधि राल, गूगल गो घृत, कपूर. चन्दन आदि के साथ संस्कार करने का विधान बनाया। 
       मृत व्यक्ति के शोक ग्रस्त परिजन जो अवसाद में रहते हें,  और उस मृत शरीर के  प्रति मोह ग्रस्त रहते हें, को मोह (सदमे) से निकालने हेतु ही यह कार्य  पूरी एक यज्ञ प्रक्रिया की तरह बनाई गई है। 
       इसमें मन्त्र और उपदेशो के माध्यम से जीवन के महत्व और शरीर के नाशवान होने की शिक्षा दी जाती है। मृत्यु से तेरह दिन तक समाज और अन्य सभी शोक प्रगट करने हेतु आकर  शोक ग्रस्त परिवार को ढ़ाढ़स बंधाते हे, और क्रमश: दशा, एकादशा, द्वादशा अंत में त्रयोदशी [दस, ग्यारह, बारह, ओर तेरहवें दिन] तक विविध तर्पण आदि कर्मो द्वारा मृत आत्मा को सम्मान प्रदान कर जीवित परिजनों संतुष्ट करने की प्रक्रिया अपनाई जाती हे।
        परिवार ओर निकट संबधियों को इन दिनों में "गीता पाठ" "गरुड पुराण" आदि कथाओं के माध्यम से बाधकर शोक को भुलाने का ओर ज्ञान वृद्धि का प्रयत्न किया जाता है। 
      अंतिम तीन दिन में तर्पण कार्य किया जाता है। इसके लिए भौतिक साधनों (वस्त्र, भोजन, फूल, चावल, आदि) का प्रयोग किया जाता हे | वास्तव में तो केवल स्थूल शरीर को ही इन भौतिक साधनों  की जरुरत होती है। आत्मा को इन सब से तृप्ति केसे होगी यह विचार आना स्वभाविक है? 
     सनातन धर्म दर्शन के अनुसार सुक्ष्म शरीर में तो विचार, चेतना, भावना, की प्रधानता रहती है। परंतु जीवित परिवार जनों के लिए उत्कृष्ट भावनाओ भरा अंत:करण और वातावरण का निर्माण करना, जिससे जीवन शांति-पूर्वक ओर शोक रहित व्यतीत हो यह भी तो आवश्यक है। 
       स्थूल शरीर धारियों के लिए जिस प्रकार इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा, एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है,  उसी प्रकार उनकी भावना में भी पितरों के तृप्त हो कर आनंद पाने का अनुभव मिलता हे।  
       वास्तव में इस प्रसन्नता, तथा आकांक्षा  का केंद्र विन्दु 'श्रद्धा' हे।  जब जीवित भौतिक शरीरधारी वर्तमान भाई-बंधु  इस कर्मकांड, तर्पण आदि की क्रिया से इस श्रद्धा भरे वातावरण के सानिध्य में, अपने पितरों को खोकर उनका अशांत मन, जब आनंद अनुभव करे, तो ही उनका शोक निवारण होग, ओर जीवन को आगे जीते रहने की शक्ति प्राप्त  होती रहेगी। 
अंत्येष्टि- भी एक यज्ञ हे ।
पर देखा जा रहा है की इन कर्मकांड को केवल लोक रीति के 
निर्वाह भर की औपचारिकता मात्र मान कर  जा रहा हे, 
और यह  "पवित्र यज्ञ " व्यवसाय बन कर नष्ट हो रहा हे। 
यही कारण है, की इस के प्रति नई पीढ़ी में 
अरुचि और पाखंड का बोध उत्पन्न हो रहा है।
     इन क्रियाओ का विधि-विधान हमारे ऋषि-मुनियों ने बड़ा सरल और इतना कम खर्च वाला बनाया है, कि इसका निर्धन भी आसानी से निर्वाह कर सके।  यह अलग बात हे की कुछ ने इसे धन कमाने का जरिया बना कर अधिक धन पाने की होड़ में दूषित कर दिया है। 
      तर्पण श्राद्ध आदि की यह पूरी प्रक्रिया जीवित पुत्रादि संबधियों को शोक निवारण कर पुन: जीवन यापन की सामर्थ्य प्रदान करती है।   अत: पितृ तर्पण, श्राद्ध कर्म किया जाना महत्व पूर्ण एवं शोक ग्रस्त परिवार की मानसिक शक्ति बढाने वाली मनोवैज्ञानिक चिकित्सा भी है। सारे विश्व के समस्त धर्मो में ऐसा केवल हमारी इस हिन्दू वैदिक परम्परा में सम्मलित है। यह हमारे लिए "गर्व" की बात है। 
    पर देखा जा रहा है, कि वर्तमान में अंतिम संस्कार, वैदिक विधान से नहीं किया जाकर केवल शरीर को नष्ट करने की प्रक्रिया ओर औपचारिकता मात्र बन कर रह गया है।  विधि पूर्वक यज्ञ विधान सभी को आता  नहीं है।  करा सकने वाले योग्य ज्ञानी, पहुच  नहीं पाते, बस सभी उपस्थित जन किसी भी तरह परम्परागत ज्ञान अनुसार दाह संस्कार कर देते हें। कही कही तो  बस शमशान में जाकर बड़े ही फूहड़ तरीके से, यह संस्कार कर दिया जाता है। शरीर को जलने के साधन के रूप में 'मिटटी का तेल ज़ैसे दुर्गंधित पदार्थो का उपयोग भी हो जाता हे। 
     इसी कारण बाद में दशा-एकादशा के दिन पुनः अग्नि संस्कार आदि  कर्म विधान से करने की परम्परा का जन्म हुआ, ताकि  श्रद्धा और वुजुर्गो के प्रति सद्भावना का बीज परिजनों के मन में बोकर मिल बाँटकर खाने खिलाने और समाज कल्याण के लिए दान पुण्य करने की भावना पैदा की जा सके। जीवन को नश्वर समझा कर सद गुणों का विस्तार हो सके, और मृत से मोह के भाव को हटाया जा सक।
      पर देखा जा रहा है की इन कर्मकांड को केवल लोक रीति के निर्वाह भर की औपचारिकता मात्र मान कर  जा रहा हे, और यह पवित्र यज्ञ कार्य व्यवसाय बन कर नष्ट हो रहा हे। यही कारण है, की इस पुनीत यज्ञ  कार्य के प्रति नई पीढ़ी में अरुचि और पाखंड का बोध उत्पन्न हो रहा है।
   हम सब ब्राम्हण समाज को जाग्रत होकर इसके प्रति चेतना जगाना होगी, क्योकि ये वैदिक संस्कार ही तो हम सब का मूल आधार हें।  यदि यह वैदिक परम्परायेँ 'पाखंड' के नाम पर बदनाम हो गई तो संस्कृति नष्ट हो जाएगी। इसकी जिम्मेदारी "ब्राम्हणत्व" पर ग़ौरव करने वाले हम सभी ब्राम्हणों की ही होगी। विशेषकर उन पर जिन्होंने आर्थिक स्वार्थ वश इसके लाभकारी भाग "धन" को स्वीकार कर शेष को भुला दिया है। ओर यह भी सोचना होगा कि की वर्तमान में ब्राम्हणों की दुर्दशा का यह भी एक कारण तो नहीं है। 
-- डॉ मधु सूदन व्यास   -उज्जैन 


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जब पुरस्कृत हो रहीं सब जातियाँ, क्यों तिरस्कृत ओर दंडित ब्राह्मण 
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